फर्जी नियुक्ति का खुला खेल खगड़िया में, नगर परिषद के आदेश को ठेंगा दिखा कर अब भी कुर्सी पर जमे ‘फर्जी बहाल’…

जांच समिति, राज्य शिक्षा परिषद, विभागीय आदेश — सबने कहा ‘नियुक्ति अवैध’, फिर भी कार्रवाई नहीं: क्या पूरा सिस्टम शामिल है इस साजिश में?

प्रवीण कुमार प्रियांशु। खगड़िया

खगड़िया नगर परिषद में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न केवल स्थानीय प्रशासन बल्कि पूरे सरकारी तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला है नगर परिषद के अंतर्गत एक कर्मी की फर्जी नियुक्ति का,जिसे नगर परिषद की जांच, राज्य शिक्षा विभाग की पुष्टि,और विधिवत आदेश के बाद भी अब तक नियोजन रद्द नहीं किया गया है।और ना ही नगर कोष में अब तक की प्राप्त राशि जमा की गई है जबकि दो दिनों के अंदर राशि जमा करने का आदेश दिया गया था।यह मामला केवल एक व्यक्ति की फर्जी नियुक्ति का नहीं है — यह दर्शाता है कि कैसे “सिस्टम के भीतर ही सिस्टम को अपाहिज किया जा सकता है”।

📌 मामले की तह में क्या है?

नगर परिषद खगड़िया के अंतर्गत कार्यरत कर्मी (रोशन कुमार) की नियुक्ति को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आईं।
नगर परिषद की स्थायी समिति की बैठक दिनांक 22.10.2024 को एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें नियुक्ति प्रक्रिया की जांच का निर्णय लिया गया।

जांच में पाया गया कि —
नियुक्ति पत्र में उल्लिखित राज्य स्तरीय आदेश या तकनीकी शिक्षा परिषद की कोई वैध अनुशंसा मौजूद नहीं थी।
राज्य शिक्षा विभाग, बिहार द्वारा जारी पत्रांक संख्या 4213 (दिनांक 14.07.2025) के अनुसार स्पष्ट कर दिया गया कि इस नियुक्ति की कोई वैधानिक स्वीकृति नहीं है।इसके बाद नगर परिषद ने दिनांक 25.07.2025 को पत्रांक 1522 के माध्यम से संबंधित कर्मी को सेवा से मुक्त करने और अब तक प्राप्त मानदेय की वसूली के आदेश जारी किए।लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात ये है —इतने स्पष्ट, दस्तावेज-आधारित और विधिवत आदेश के बावजूद संबंधित कर्मी आज भी पद पर बना हुआ है।

👉 आदेश को निष्प्रभावी बनाकर छोड़ देना,
👉 नगर कोष में अब तक की प्राप्त राशि की वसूली नहीं करना,
👉 और बिना वैधानिक नियुक्ति के कार्यरत कर्मी को जारी रखना —
इन सब बातों ने इस पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

क्या प्रशासन की चुप्पी इत्तेफाक है, या मिलीभगत?
यह प्रश्न अब आम जनता से लेकर प्रशासनिक हलकों में भी उठ रहा है कि — क्या एक अकेला व्यक्ति इतने बड़े घोटाले को अंजाम दे सकता है? या फिर पूरा सिस्टम ही मौन समर्थन में है?
नगर परिषद स्वयं अपने ही आदेश को लागू नहीं कर पा रही — ये एक असहाय संस्थान की नहीं, बल्कि संलिप्त संस्थान की तस्वीर पेश करता है।
🔍 जनता में आक्रोश, उठी उच्च स्तरीय जांच की मांग
स्थानीय जनप्रतिनिधि, पारदर्शिता समर्थक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने अब CBI जांच, या राज्य निगरानी इकाई (SVU) से मामले की विस्तृत जांच की मांग की है।
वेतन की वसूली,विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही और नगर परिषद की निष्क्रियता — तीनों स्तरों पर एक साथ जांच की जरूरत महसूस की जा रही है।
📣 विशेष संवाद: “ये सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, ये विश्वासघात है जनता के साथ”
एक स्थानीय RTI कार्यकर्ता ने कहा:
“जब खुद नगर परिषद द्वारा नियुक्त समिति कहे कि नियुक्ति फर्जी है, और फिर भी कोई कार्रवाई न हो — तो ये समझना मुश्किल नहीं कि भ्रष्टाचार सिर्फ गलती नहीं, अब नीतिगत हिस्सा बन चुका है।”
📍 अब सवाल यह है…
अगर यह व्यक्ति सेवा में अवैध रूप से बना हुआ है, तो किसके संरक्षण में?
अब तक वसूली क्यों नहीं हुई?
नगर परिषद अपने ही आदेशों को लागू क्यों नहीं कर रही?
क्या यह मामला अकेले रोशन कुमार तक सीमित है या इस तरह के और नियुक्ति घोटाले दबाए जा रहे हैं?
“जब फर्जीवाड़ा खुले आम हो और आदेश सिर्फ फाइलों में दम तोड़े — तब जान लीजिए,भ्रष्टाचार अब नियम बन चुका है।”
इस पुरे मामले में पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सह रेटेनर नगर परिषद खगड़िया श्री विक्रमादित्य सिंह ने कहा-

“यह एक अत्यंत गंभीर मामला है। जब किसी नियुक्ति को नगर परिषद की जांच समिति, राज्य शिक्षा विभाग और विभागीय आदेश द्वारा ‘अवैध’ घोषित किया जा चुका है, फिर भी यदि वह व्यक्ति अब तक सेवा में बना हुआ है, तो यह सीधा-सीधा कानून के शासन का उल्लंघन है।
नगर परिषद द्वारा जारी सेवा समाप्ति आदेश को निष्क्रिय छोड़ देना न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 311 (सरकारी सेवक की सेवा समाप्ति की प्रक्रिया) का भी खुला उल्लंघन हो सकता है।
अगर किसी व्यक्ति ने फर्जी तरीके से नियुक्ति प्राप्त की है और फिर भी उसे हटाया नहीं जा रहा, तो इसमें स्पष्ट रूप से ‘प्रशासनिक मिलीभगत’ या ‘निष्क्रिय सहमति’ की बू आती है।इस तरह के मामलों में स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य निगरानी विभाग, लोकायुक्त या उच्च न्यायालय द्वारा PIL (जनहित याचिका) के माध्यम से हस्तक्षेप किया जाना चाहिए।इसके अलावा, यदि वसूली का आदेश दो दिनों में राशि जमा करने को कहता है, और महीनों बीतने के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, तो यह लोक धन की बर्बादी और आपराधिक लापरवाही का विषय बनता है।अंततः, यह सिर्फ एक नियुक्ति घोटाले का मामला नहीं है — यह उस पूरे तंत्र की पोल खोलता है जो भ्रष्टाचार को संरक्षण देता है। इस पर उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच अनिवार्य है।”














































